Monday, June 2, 2008

रातों रात ऊंचा किया कद...

रात के समय कम कद वाली मूर्ति हटाई जा रही थी और सुबह होने तक शानदार और भव्य ऊंचे कद वाली मूर्ति वहां मौजूद थी। तो कैसा लगा आपको ये रातों रात कद बढ़ाने वाला फॉर्मूला? वास्तव में दृश्य कुछ वैसा ही था जैसा सद्दाम हुसैन की मूर्तियां गिराने के वक्त रहा था। एन डी टी वी के कमाल खान के अनुसार, अंतर सिर्फ इतना था कि सद्दाम की वो स्थिति सब कुछ खोने के बाद हुई थी और मायावती की मूर्ति ढहाने के वक्त वो अपनी ज्यादा ताकत के साथ मौजूद थीं। मेरी नज़र में अंतर ये भी था कि सद्दाम की मूर्ति गिराने में लोगों को उतनी मशक्कत नहीं करनी पड़ रही थी जितनी कि इस मूर्ति को ससम्मान हटाने में हो रही थी.... यानी अंतर ढहाने और हटाने का भी था। साथ ही भावनाओं का अंतर तो रहा ही होगा.... क्योंकि टिकरित में जश्न के बीच लोगों की भावनाएं बयां हो रही थीं...और यहां लखनऊ में एक आदेश का पालन। आखिर प्रदेश की मु्ख्यमंत्री मायावती अपनी मौजूदा मूर्ति, जो उन्होंने कुछ समय पहले ही लगवाई थी, से संतुष्ट जो नहीं थीं। आपका सवाल जरूर ये होगा कि आखिर असंतुष्टि की वजह क्या रही? दरअसल कुछ समय पहले लगवाई खुद की मूर्ति, प्रदेश की मुख्यमंत्री को पास ही लगी एक मूर्ति से हल्की और कम ऊंचाई वाली लग रही थी। पास ही लगी मूर्ति का नाम अगर खुद मायावती के शब्दों में बयान करने को कहा जाए तो.... मान्यवर कांशीराम जी की थी।
मायावती को जैसे मूर्तियों का कद छोटा और बड़ा आंकने की नई आदत लगी है। कुछ दिनों पहले ही उनके आदेश से एक और मूर्ति हटाकर नई लगाई गई, जो पास वाली मूर्ति से कम कद की थी। हटाई गई मूर्ति थी डॉ.अम्बेडकर की और पास वाली मूर्ति थी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की। उस वक्त एक विचारक की कही बात कल फिर ज़ेहन में घूमी कि अगर ऊंची मूर्तियां लगाने से किसी का कद बढ़ता है तो क्यों ना पहाड़ पर अपनी मूर्ति लगाई जाए।
खैर.... चाहे जो हो, जीते जी अपनी मूर्तियां लगाने वाली वे देश की पहली नेता तो बन ही गई हैं। शायद ऊंचाई वाली मूर्तियां लगाकर भी कोई नया रिकॉर्ड बनाने की तहरीर शुरू होती हो....

5 comments:

बाल किशन said...

मूर्तिवती या मायावती जो भी कहें इनको तो लगता है कि यही समझ मे आता है जितनी बड़ी मूर्ति उतना बड़ा नेता.
और काम भी क्या है इनके पास जन्मदिन मनाओ मूर्ति का कद बढाओ. बस.

Udan Tashtari said...

अफसोस होता है ऐसे नेताओं की सोच पर.

dushyant said...

नेताओं के कद बढ़ाने और घटाने का सिलसिला मायावती के भी पहले से कायम है चाहे वो इंदिरा हो या सोनिया...अब माया ...मायावती ने अपनी मुर्ति का कद बढ़ाकर साबित कर दिया है कि वे भी अब एक शहर...या एक राज्य की नेता नहीं रह गई है...नकी नज़र तो अब केंद्र पर है...तो सावधान...आपको आगे भी इन पर और लिखने का मौका मिलने वाला हैं।

Anonymous said...

'माया महाठगिनी हम जानी', संत कबीर ने जो बात सदियों पहले जानी आज उसे सारे जग ने मानी। माना माया है जी का जंजाल पर यूपी में कर दिया कमाल। बिन एमएलए बने ही मुख्यमंत्री बनी वह ऐसे, बिन बदरा के चमके बिजुरिया जैसे। बिजनौर की इस बाला में है बला कि हिम्मत, मुलायम की पलट दी थी तब मिनटों में किस्मत। जिसे हटा नहीं सके थे कल्याण सिंह और तिवारी उसे सिंह को इसने टक्कर मारी। ब्राह्मण को झाड़ा, मनु को लताड़ा, बोल उठी थी फिर भी जय श्री राम, जुग जुग नहीं जी पाएं काशीराम। राम की ही माया है माया की ही काशी है, तो किसको मिलनी फांसी है। सद्दाम का बुत हटाया गया जबकि माया ने अपना बुत खुद ही हटा लिया। तो आपको क्यों परेशानी हो रही है मोहतरमा। बहरहाल, बुतों के आगे आपने जो बीन बजाई है, वह सांपों के 'कान' अगर होते हो, जो जरूर खड़े कर देगी। बधाई!

-अमित पुरोहित

tarushree sharma said...

जनाब,
बात बुत हटाने की नहीं हो रही है। कुछ लोग माहिर होते हैं बिना सोचे समझे बात को गलत दिशा देने में या शायद मायावती में आपकी आस्था ने आपको भावुक बना दिया है। बात बुत का कद बढ़ाकर स्थापित करने की हो रही है, अगर आपने मेरी पूरी बात पढ़के कमेंट दिया है तो आपने जरूर इस चीज को समझा होगा। कान किसके खड़े होते हैं और क्यों?, इसे देखकर अपनी बात कहना मैंने अभी सीखा नहीं है... मेरा सम्प्रेषण सिर्फ सम्प्रेषण की तरह है....उससे किसे फर्क पड़ता है, यह सोचकर मैं अभी बहुत ज्यादा ऊर्जा गंवाना नहीं चाहती क्योंकि मुझे मेरे दायरे पता हैं।
लेकिन हां, माया की गाथा गाने के लिए आपका धन्यवाद। अगर आप बुत लगाने के अभियान को सही करार देने की कोशिश में हैं तो माफ कीजिए आपके जैसे युवा नेताओं की देश को जरूरत नहीं... जो सिर्फ अपना कद बढ़ाना जानते हों, देश और समाज का नहीं। क्योंकि देश और आम जनता का कद बढ़ाने के लिए, खुद के बुत स्थापित करने में करोड़ों रूपए खर्च करने का कोई औचित्य नजर नहीं आता।

तरूश्री शर्मा