Wednesday, July 29, 2009

यही गलतफहमी थी शायद....

वो आए तो हो गया यकीं हमको..
एक इसी की आरजू थी शायद।


दरख्तों के रोने का इल्म ना था,
परिंदों के उड़ने की जिद थी शायद।


फिक्र ना थी कि पाना है तुम्हे,
फिक्र तो जुदाई की थी शायद।



दामन-दामन जर्रा जर्रा बुत बना,
उसीके होने से रौनक थी शायद।

समझते थे कि समझा लेंगे, 
यही गलतफहमी थी शायद।



रास्ते संग थे तो साथ ना थे,
हुए जुदा तो करीबी थी शायद।


खुदा से बढ़कर हम हुए हैं कब,
खुदाई का कोई कतरा थी शायद।





Wednesday, July 22, 2009

चांद पाने की जिद है जिंदगी!!!

आज फिर दिल ने एक तमन्ना की,
आज फिर दिल को हमने समझाया.



हमेशा लगता है दिल तमन्नाओं का ढेर है जिसमें उम्मीदें बुदबुदे की तरह अंगड़ाई लेती हैं...और जब पकड़ने की कोशिश करो...हाथ ही नहीं आती। कौन है जो दावा करता हो,कि मैं इसे पकड़ने की कोशिश नहीं करता। क्यों ना की जाए...फिर क्या सांस लेना और छोड़ देना जीवन कहा जाएगा? मैं नहीं मानती। जिंदगी की परिभाषा इस बुदबुदे के फूटने और इसे पकड़ने का उपक्रम ही तो है। किसके कितने बुदबुदे फटे और कितने पकड़ने में वो कामयाब हो गया... जिंदगी इसका नाम भी नहीं। बल्कि इसका जरूर हो सकती है कि किसने कितने बुलबुले पकड़ने की कोशिश की।
नाकामियों से जिंदगी की दिशा निर्धारित होती है...दशा नहीं। बल्कि सफलताएं कई बार दिग्भ्रमित करती हैं। आप भटकने लगते हैं और खुशी के सैलाब में एहसास तक नहीं कर पाते। मैं भी भटकी हूं कई बार...आप भी भटके हैं...सवाल है उस भटकाव से कैसे खुद को बाहर खींच लाएं? बहुत मेहनत करनी पड़ती होगी ना...गुरेज नहीं,क्योंकि भटकाव के उद्वेलन से बाहर आने के लिए आप उतनी मेहनत कर सकते हैं जितनी खोती जिंदगी को वापस पा लेने के लिए।
आज ग्रहण था...मैं सूरज और चांद की लुका छिपी से बनने वाली हीरे की अंगूठी (डायमंड रिंग) देखने के लिए उत्सुक थी। मैंने देखी...लगा एक नया बुदबुदा मिल गया है पकड़ने के लिए। फिर कवायद शुरू होगी...लगा जैसे जिंदगी की उमंग लौट आई है। बचपन में मैंने कभी चांद पकड़ने की जिद या कोशिश नहीं की। उम्र बढ़ने के साथ ये जिद कहां से आई,पता नही।
हां इतना पता है इस जिद का एहसास जब-जब हुआ,लगा कि मैं जिंदगी जी रही हूं।
अब मुझे नई रिंग चाहिए... प्रतीकात्मक है। पहले ही कह चुकी हूं मिलना या ना मिलना जिंदगी नहीं, उसे पाने की कोशिश करना जिंदगी है।

चांद पकड़ने की जिद है जिंदगी,
पाने की ख्वाहिश है जिंदगी।
तमाम उम्र जियो ना जियो,
खोकर पाने की कवायद है जिंदगी।


सितारा तो हमेशा दूर होता है,
हसरतों का साथ कब काफूर होता है....
चिड़ियों के बिछौने सी सख्त है राहें,
उन्हें नर्म बनाना ही तो है जिंदगी।


रात से सुबह औऱ सुबह से शाम,
गंवाकर हर दिन अंधेरा तमाम,
फिर दिन उगता है शाम ढलती है,
इसका इंतजार ही तो है जिंदगी।

Friday, March 20, 2009

वक्त लगा पर किस्सा खत्म हुआ



(उलझा उलझा सा है बहुत कुछ। कई बार दिमाग इतने गहरे और उथले स्तर पर किलोलें करता है कि भाव पकड़ना मुश्किल हो जाए। ऐसे ही किसी चंचल और व्यग्र वक्त को शब्दों में पकड़ने की कोशिश।)

कई कई दिनों की बेचैनी और आए दिन की कलह... बादल छंटने को हैं। रिश्ते की डोर को कब तक उलझाए रखा जाए। दर्द था कि दवा बनता ही नहीं था... उल्टे दिन पर दिन जहर होता जाता। 

क्या सोच के सिरे इतने कड़े हो सकते हैं या डर का शिकंजा इतना मजबूत कि इंसान अपने आप से दूर होता चला जाए... अपनी सुविधाओं तक को ताक में रख दे और बेंइंतहा मोहब्बत तक इस ऊहापोह में दम तोड़ दे... 

ये उसके जीवन का पहला अनुभव था।
क्या अपनी सोच से बनी काल्पनिक दुनिया की दीवारें इतनी मजबूत हो सकती हैं कि कोई उन दीवारों पर सिर फोड़ फोड़ 
कर मर जाए...पर वे ना टूटें। परम्पराएं और उससे निकलने के तर्क भोंथरे होने लगें और इस भोंथरी धार पर जिंदगी के सपने कट-कट कर लहुलुहान हो जाए...


सबसे ऊपर इस सबमें आदर्श नीतियों का कोई पुट नहीं,
स्थिति के विश्लेषण की कोई सम्भावना नहीं... फिर इसे सही ठहराएं तो कैसे?

वो कोई स्थिति नहीं जिसमें राहत की कोई किरण नजर आती हो लेकिन सामने वाला आपको उस नीम अंधेरे में सहज रहने की नसीहत दे...बिना किसी दिलासे के। बेहद मुश्किल होता है तर्कों की मजबूत डोर छोड़कर बिना किन्हीं तर्कों वाले मौन कमजोर तिनके से डूबने से बचाने की उम्मीद लगाना। 

ऐसा दिमाग तो कतई नहीं कर सकता, बेशक दिल का मामला ये जरूर हो सकता है। लेकिन दिल को भी खाद की जरूरत होती है.. दिलासे के दो बोल या हिम्मती बातें दिल पर हाथ तो जरूर रखती हैं। दिल धड़कने लगता है.... और हाथ उसे महसूस करने। 

हालांकि इस भाव में रहने की भी कोई उम्र तो होती होगी ना... उम्र पूरी हो गई... बिना किसी उम्मीद के पूरा हुए.... चलो एक किस्सा खत्म हुआ। 

दुखद या सुखद से इतर एक मिले जुले भाव वाला अंत। किसी नए किस्से के सुखद अंत की शुभकामनाएं दीजीए।

Wednesday, January 28, 2009

कटी-कटी एक पतंग/जंग जारी है?


एक अरसे तक खुद को कटी पतंग पाया उसने। लेकिन इर्द गिर्द की दूसरी कटी पतंगों से कुछ अलग!!
सबसे ज्यादा फटी पतंग थी लेकिन हौंसला इतना कि एक हाथ मिलते ही सबसे ऊपर उड़ ले। लेकिन वो हाथ....?
हौसलों के बावजूद एक भाव था जिसे वो क्या कहे... अपनी अकमर्ण्यता,नाउम्मीदी या थकान.... समझ नहीं पाती, उसे उन हाथों का इंतजार कभी नहीं रहा। सारी हलचल अपने अंदर रखते हुए फड़फड़ाती थी,अपनी ऊर्जा का उपयोग करने के लिहाज से शायद। हर पल सोचती जरूर थी,ये ऊर्जा उसे कितना ऊपर पहुंचा सकती है.... औऱ वो इसे व्यर्थ गंवा रही है। हां, वो ये जानती थी कि किसी एक दिन अपनी ऊर्जा के सही उपयोग के लिए,आज फड़फड़ाना बेहद जरूरी है ताकि जड़ता हावी ना हो जाए। आस-पास की पतंगें उसे निरा मूर्ख समझती थीं औऱ कुछ उसे अपना नेता मान चुकी थीं। बस यही था जो उसे बताता था कि कौन जड़ है और किसमें अभी जान बाकी है।

दूर कहीं एक देश सा था...कुछ लोग उसे गांव भी कहते थे। उसे वो दुनिया लगता था। दरअसल यहीं वो बनी थी,यहीं उसने कई बार आसमान की ऊंचाइयों का स्वाद चखकर जमीन की धूल चाटी और यहीं से कट कर भी गिरी थी। उसकी पूरी दुनिया का विस्तार वहीं से शुरु होता था और वहीं से खत्म हुआ। कहां आ गिरी...शायद अब कोसों दूर हो। वहीं जाना चाहती है वापस। चौराहे के पास वाले बरगद के नीचे बैठी दादी कहती थी,औरत की फितरत ही होती है,जहां से लात पड़े भावनाओं में बंधकर वहीं लौट आना। तभी तो औरत की स्थिति सुधरती नहीं कभी। क्या मैं भी एक औरत सी हूं... नहीं!!!! सिर झटका उसने। एक दिन आसमान में उड़ते परिंदे के पांव से उसका मांजा लगा कि परिंदा धड़धड़ाता नीचे आ गिरा। मुंह में दाना था उसके... दादी ने कहा था घर लौट रहा था ये अपने बच्चे को खाना खिलाने के लिए...अब अपने पैर के दर्द से ज्यादा इसे बच्चे की भूख का दर्द सताएगा। आखिर औरत है ना ये।
उसे भी तो दर्द होता था उन बच्चों का जो उसे उड़ाकर खूब खुश होते थे...उछलते थे। अब.... ओह। क्या वो भी एक औरत है....हममम।
खैर, सोच का एक सिरा और खुला। एक दिन छुटकु की लाई एक पतंग छुटकी उड़ाने ले चली। जैसे ही छुटकु को पता चला उसने शुरु कर दी छुटकी की पिटाई। रुलाई सुनकर चौपाल से मूंछों वाले चाचा भी चले आए। सारी बात सुनकर लगे छुटकी को डांटने.... पतंग उड़ाना तेरा खेल नहीं है। घर में चूल्हा चौका कर... छोरे को उड़ाने दे पतंग। मतलब क्या मैं लड़कों के ही मनोरंजन का साधन हूं.. तो क्या मैं भी औरत....हां शायद मैं वही हूं, अब तो वो बेशक सिर भी नहीं झटक पाई थी।
खुद को बिल्कुल कटा-फटा और कटा सा पाया उसने। कुछ था जो सिर उठाने को था, और बहुत कुछ था कुचलने के लिए।

ये जंग तो सदियों से जारी है....
जो पंख कल आसमां का फख्र थे,
आज जमीन पर भी भारी है...
कोई कहने ना पाए कि वो सिर्फ नारी है।

Friday, January 16, 2009

बस एक बार....

कुछ ही वक्त गुजरा होगा,
जब तुम मेरे सब कुछ थे..
जिसे मैं नहीं दे पाती थी कोई नाम।

उस धुरी की तरह...
जिसके इर्द-गिर्द,
मेरी जिंदगी सा कुछ टंगा था...
और मैं कोशिश करती थी,
उसे खींच लाने की अपने पास...
कई बार....
लेकिन हर बार नाकाम।
शायद तुमने भांप लिया था-
तभी तो आए थे एक दिन-
लौटाने मेरी जिंदगी सा वो कुछ,
जो बोझ सा टंगा था तुम्हारे इर्द-गिर्द।
हां...
मैं उसे लिवाना कब चाहती थी...
और तुमने भी कब पूछी थी,
मुझसे मेरी ख्वाहिश...
तुम्हीं तो कहते थे ना...
ख्वाहिशें नर्म होती हैं,
मखमली कालीन पर अलसाई सी..
और कभी-कभी,
जिंदगी की रेत पर फिसलती सी।

अरसा हो गया है अब...
और जिंदगी ने देख लिया है,
ख्वाहिशों का फलसफा...
कुछ कुछ तुम्हारे फलसफे से-
मिलता-जुलता सा।

तुम आना एक बार...
देखना कि कैसे ख्वाहिशों से,
बनती है जिंदगी...
रेत का ढेर और
कैसे हवा का एक झोंका,
उस पर बना जाता है
तुम्हारा अक्स...
तुम आना जरूर,
बस एक बार....
आओगे ना?

Thursday, December 25, 2008

क्या होगा?


नए साल में नया क्या होगा...
वोही रात वोही दिन..
वही तुम और वही मैं।

झुटपुटे से निकलता चांद,
साथ के छिट-पुट तारे,
पर कौन हमारे...

छिटकी सी धूप,
अलसा के खोया रूप,
कैसा प्रतिरूप...

रात की आसमानी आंच,
इर्द गिर्द लहराता सा बोझ,
किसकी सोच....

दीमक सा दिखता घुन,
रोने लगी है धुन,
कहां रुनझुन....

बरगद की बटेर,
कुहरे की देर,
कौन सवेर...

तारीखों के ढेर,
दिनों के फेर...
कैलेंडरों की सेल...

नए साल में कुछ भी ना होगा नया
सिवाय नए अंकों के...
और मशरूम के जालों के भीतर से,
बाहर आती एक दुर्गंध की तरह,
निकल आएंगी कुछ गंधियाती गालियां...
जो देनी होंगी हमें अपने आप को,
अपने तंत्र को,
सरकार को,
नेताओं को...
और भी ना जाने किसे किसे...
इसमें नया क्या होगा?

Thursday, December 4, 2008

आपको तो आती होगी आवाज...

इस नाशुक्रे से दौर में आखिर वे क्यों नहीं समझते कि क्या परोस रहे हैं... क्यों और आखिर कब तक... क्या जब तक हमारी आवाज हम तक पहुंचना बंद हो जाए????

मुझे अब कोई आवाज नहीं आती।

भले ही,
बमों के होते हैं धमाके,
कई राउंड चलती है गोलियां,
ग्रेनेड्स भी कभी कभार आ गिरते हैं,
लेकिन मुझे....
कोई आवाज नहीं आती।

औरतें रोती हैं,
आदमी क्रोध में कांपते हैं,
बच्चे भी पूरा मुंह खोलकर-
आंसू गिराते हैं...
लेकिन मुझे...
कोई आवाज नहीं आती।

कहीं दिखते हैं,
चेतावनी के शब्द।
घूमते कमांडो-पुलिस के जवान,
गुजरती हैं,
दनदनाती लालबत्तियां भी,
लेकिन मुझे....
कोई आवाज नहीं आती।

धुंआ दिखता है,
भीड़ दिखती है,
आक्रोश दिखता है,
कोई मोमबत्तियां ले जाते,
तो कोई,
शहीदों को चढ़ाने बड़े बड़े फूल,
कुछ हाथ उठाकर,
कुछ कहने का अभिनय करते से,
और कुछ
नेता से दिखते दरिंदे सिर झुकाकर मौन,
कुछ आस्तीनों में रेंगती सी परछाइयां,
कुछ भैंस के आगे बजती सी बीन,
लेकिन मुझे...
कोई आवाज नहीं आती।


उफ्फ...कोफ्त है या...
कानों में क्यों अहसास नहीं,
आखिर क्यों...
क्यों,वक्त की आवाज आज साथ नहीं।
कहीं ये बहरापन?????

नहीं.. मुझे अब भी आती है आवाज,
हाथ के रिमोट पर अंगुलियों के जाते ही,

ये है वो आतंकवादी...,
ये उसका परिवार..,
ये उसकी मां..,
ये उसकी बहिन..,
ये पिता..,
ये बेचारा, परिवार बेचारा,
मुल्क बेचारा,जनता बेचारी,
नेता बेचारा,
बम बेचारे, आका बेचारे
और उफ्फ्फ.... कितने बेचारे हैं ये कान।

तरूश्री शर्मा

Tuesday, November 25, 2008

यही है ना वो भूख?


दिल्ली की ठंडी शाम थी और महज चार घंटे बाद ट्रेन। मैं, मेरी बहिन और उसकी फ्रेंड सहित हम चार लोग थे और करोल बाग के बाजार में शॉपिंग के बाद एक और दोस्त को साथ लेकर किसी रेस्टोरेंट में खाना खाना था। इसके बाद राजेन्द्र प्लेस की एक होटल से अपना सामान उठाकर नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंचने तक की पूरी कवायद दिमाग में चल रही थी। शॉपिंग पूरी होते होते लगभग दो घंटे बीत गए थे और निकलने के समय कपड़ों की ऑल्टरेशन में लगभग 20 मिनट लगने की बात स्टोर कीपर ने कह दी थी। सोचा, तब तक अपने साथ के एक मित्र को बाहर से कुछ औऱ शॉपिंग करनी बाकी रह गई थी सो वही करा दी जाए। आखिर टाइम मैनेजमेंट पर पूरा ध्यान केंद्रित था। बाहर आ कर खरीददारी करने में बमुश्किल सात आठ मिनट लगे कि तभी गोल गप्पे वाला दिख गया। बस... फिर क्या था, गोल गप्पे वाला दिखे और मैं गोल गप्पे ना खाऊं, ये तो हो ही नहीं सकता ना। सारा सामान उठाकर गोलगप्पे वाले के पास पहुंच गए। इस खाने पीने से निवृत्त होते तब तक पन्द्रह मिनट बीत चुके थे। सो सारा सामान अपने साथ के लोगों के हवाले छोड़कर मैं कपड़े लेने स्टोर पहुंच गई। कपड़े तैयार थे, फटाफट लिए और तब तक सभी लोग बाहर आकर मेरा ही इंतजार कर रहे थे। खाना खाने के लिए साथ आने वाला मित्र भी पहुंच चुका था और हमें निर्धारित स्थान पर पहुंचने के लिए ऑटो रिक्शा ही सबसे उचित साधन लगा। तो बस ऑटो में सवार होकर सभी निर्धारित स्थान पहुंचे कि तभी ध्यान आय़ा...
उफ्फ....मेरा पर्स कहां है?
तभी ध्यान आया कि शायद गोलगप्पे वाले के पीछे खड़ी कार पर ही छूट गया हो। अब क्या किया जाए...
ट्रेन छूटने में महज डेढ़ घंटा बाकी था। बहिन और उसकी फ्रेंड ने कहा हम लोग ढूंढ लाते हैं तब तक आप लोग जाकर खाना ऑर्डर करो... जब तक ऑर्डर पूरा होगा....हम लौट आएंगे।
आईडिया बढ़िया था सो हम लोग दो भागों में बंट गए। खाने का ऑर्डर तो किया लेकिन मन खाने में कम पर्स में ही ज्यादा था। तभी फोन आ गया कि पर्स गोलगप्पे वाले के यहीं मिल गया है और बाकी की सारी कहानी वहां आकर बताते हैं। थोड़ी सांस आई। खाना आने तक वे लोग लौट आए थे। खाना खाते खाते बात हुई...
गोलगप्पे वाले ने पर्स में बम समझकर उसे दूर कम भीड़ भाड़ वाले स्थान पर रख दिया था। पुलिस को इत्तिला इसलिए नहीं दी कि कल से उसका ठेला वहां लगने नहीं देंगे। इन लोगों के जाते ही वो जैसे उबल पड़ा।
ध्यान क्यों नही रखते हैं आप लोग... मेरी रोजी पर संकट आ जाता आप लोगों की वजह से। और भी बहुत कुछ....
शायद इसीलिए कहते हों कि डर के आगे जीत है।
क्या करते, सब कुछ सुनते रहे चुपचाप। आखिर पर्स मिल गया था.... चुपचाप सारी बातें सुनकर और उसे धन्यवाद कहते हुए ये लोग लौट आए। काम निपटा कर सही वक्त पर स्टेशन पहुंचे और ट्रेन भी पकड़ ली। तब कुछ सोचने का वक्त मिल पाया....
इतने भीड़ वाले इलाके से पर्स मिलना नामुमकिन सा लग रहा था... लेकिन मिल गया। खुशी बेहद हुई पर सवालों ने दुखी कर दिया....
अगर वह वास्तव में मेरा पर्स नहीं किसी आतंककारी का रखा बम होता तो कितनी जानें लेता?
मेरे देश का आम आदमी किस दहशत में जिंदगी बसर कर रहा है?
संवेदना भूख पर हमेशा भारी पड़ती है। आम आदमी बेचारा अपनी दो समय की रोटी कमाने के बीच इतना कहां सोच पाता? पर्स देखते ही उसे अपनी बीवी बच्चों की शक्ल याद आई होगी। बम हो सकता है और नहीं भी हो सकता, ऊहापोह में कुछ देर रहा होगा। देश के कानूनी फेर याद आए होंगे और ऐसे में विस्फोट में मरने वालों से ज्यादा खुद ही की चिंता होना लाजिमी था।
कुछ ऐसी ही भूख होती होगी वो जो एक आम आदमी को संवेदनहीन आतंककारी में तब्दील करती होगी....क्या कहते हैं आप?

Friday, September 26, 2008

मां की तनख्वाह!!!!!!!


वो अनाथालय मुझे हमेशा पूजा घर जैसा लगा। हालांकि मैं जब भी स्नेह छाया जाती मेरी आत्मिक संतुष्टि का स्वार्थ मेरे साथ जुड़ा होता। लेकिन बाहर आकर मैं खुद को बहुत बड़ी लगने लगती जैसे मैंने कईयों पर अहसान कर दिया कुछ किताबें, खाने की वस्तुएं और कपड़े देकर। फिर इन निम्न कोटि के ख्यालों का ध्यान आते ही मुझे खुद की इस सोच पर अपने आप को धिक्कारने का मन करता, और मैं बड़े लिहाज के साथ खुद को धिक्कारती। इंसान खुद को कहां दूसरों की तरह धिक्कार पाता है।
हर बार की तरह इस बार भी रोहित मुझे देखकर तेज चहका.... दीदी की हांक लगाता हुआ दौड़ा चला आया और मुझसे चिपट गया। उसका मुझसे यूं लिपटना जैसे मेरे अंदर ममता के स्रोते जगा देता और मुझमें जैसे एक अजीब से भाव का संचार होने लगता जो दूसरे सभी भावों पर हावी होता। मैं सारी दुनिया से कटकर सिर्फ एक मां रह जाती, खासकर रोहित की मां। उस छह साल के बच्चे की मां, जो किसी बाढ़ में अपना परिवार खोकर अब किसी अपने की तलाश की कोई इच्छा बाकी नहीं रखता। शायद मेरा इंतजार भी वो कभी नहीं करता, लेकिन मुझे देखकर खुश जरूर होता था।
कई बार उसके बारे में सोचती तो लगता कि जैसे उससे मेरा कोई पुराना नाता है। जिस दिन अनाथालय जाती शायद उसी दिन रोहित मेरे और मैं रोहित के साथ खुश रहती, इसके अलावा हमारा कोई संबंध नहीं रहता। मेरे आने के बाद मुझे उसकी ऐसी कोई याद नहीं आती,जिसका उल्लेख किया जाए। ना ही उसकी बातों से कभी लगा कि वो मुझे याद करता है। आश्चर्य होता कि ये कैसा रिश्ता है जब मिलते हैं तो एक दूसरे को छोड़ने का मन ही नहीं करता और जब छोड़ देते हैं तो मिलने का मन नहीं करता।
- दीदी, इस बार कुछ मोटी लग रही हो तुम।
- सच.... ओहो रोहित अब फिर कम खाना पड़ेगा।
- क्यों दीदी... क्यों खाने में कटौती करती हो, सब कहते हैं भगवान सबको चोंच देता है तो दाना भी देता है फिर मोटा होना तो अच्छा है ना।
- अरे...फिर तू ही अगली बार कहेगा कि दीदी मोटी हो गई हो अच्छी नहीं लग रही।
- नहीं दीदी... मुझे तुम हमेशा अच्छी लगती हो।

रोहित मुझसे चिपट गया। मैंने उसके बालों में हाथ फेरा....

- रोहित, शैम्पू खत्म हो गया क्या। बाल चिपके चिपके लग रहे हैं...
- हां दीदी, काफी दिन हो गए।
- अरे तो मुझे बताया क्यों नहीं? फोन नंबर दिया था ना मैंने अपना, कभी फोन क्यों नहीं करते?
- आप भी तो मुझे नहीं करतीं। फिर मैं ही क्यों करूं क्योंकि मेरा शैम्पू खत्म हो गया, आपको मुझ से कोई काम नहीं पड़ता तो मुझे फोन नहीं करतीं...
- ऐसा नहीं है रोहित समय नहीं मिल पाता ना!!!
- क्यों,आप क्या करती हो पूरे दिन...आपको तो स्कूल भी नहीं जाना होता।
- अरे,पर ऑफिस तो जाना होता है ना!
- क्यों जाती हो दीदी ऑफिस?
- ह..म..म..म.... कमाने जाती हूं रोहित बेटा।
- ओह...आपके तो मम्मी पापा है ना..फिर आप क्यों कमाती हो?
- अब मैं बड़ी हो गई हूं ना...इसलिए!!!
- ओह, तो दीदी मैं भी जब बड़ा हो जाउंगा, कमाने के लिए ऑफिस जाउंगा।
- ठीक है,जरूर जाना। अभी बताओ..

- दीदी, एक दिन सड़क से बिल्कुल तुम्हारे जैसी लड़की जा रही थी। दीपक ने सबको बताया कि शायद आज दीदी आएगी सबके लिए बिस्किट लेकर... लेकिन तुम तो नहीं आईं। उस रोज मैंने दिन का नाश्ता भी ठीक से नहीं किया। फिर पेट भर जाता तो तुम कहतीं कि मैं जो लाती हूं तुम खाते नहीं हो....
- ओह....तुम एक फोन कर लेते रोहित...भूखे रहना पड़ा ना एक दिन
- कोई बात नहीं दीदी, शाम को पेट भर के खा तो लिया था फिर।
- मैं तुम्हें ढेर सारे बिस्किट दे जाती हूं इस बार...तुम उन्हें छिपा के रख लो, जब मन करे खा लेना।
-लेकिन दीदी, फिर दीपक,मनु,रेखा,अदिति और अली का क्या होगा...वो कैसे खा पाएंगे, तुम सभी के लिए ढेर सारे दिला जाओ।
उफ्फ... मन के अंदर कुछ चटका।
आंखों से लिजलिजा सा कुछ बहने लगा... मैं वहां होकर, वहां से बहुत दूर चली गई।
पहली बार मन इतने कड़वे तरीके से रोया, हे ईश्वर!!! मेरी तनख्वाह इतनी कम क्यों है?
खैर, इन दिनों मैं नई नौकरी ढूंढने में लगी हूं।

तरूश्री शर्मा

Saturday, August 23, 2008

सवालों के ढेर से....धुंए के छल्ले


रातें हर रोज खाली खाली सी रहने लगी थीं....
जैसे तारे आसमान से अब चिपकते ही ना हों और चांद की डोरी आकाश से लटकती ही नहीं थी। रात का सन्नाटा जैसे होता ही नहीं था और अंधेरे की कालिख पसरती ही नहीं थी।
दिन जैसे दिन की तरह नहीं होते थे....
सूरज का रथ जैसे दौड़ता ही नहीं था और और धूप के गोले जैसे उतरते ही नहीं थे। दिन का शोर जैसे चिल्लाता ही नहीं था और रोशनी की पीली खिड़कियां खुलती ही नहीं थी....
वो इस अजीब से समय में गुत्थम गुत्था सवालों के जाल में खोया रहता था....गोया,
ये दीवार क्यों नहीं चलती और चलती होती तो कहां तक पहुंच चुकी होती? क्या ये मुझसे तेज चल पाती और क्या मेरी तरह तेज दौड़ पाती? मेरी अनुपस्थिति में मेरे स्केट्स पहन कर घर में कोहराम मचा देती या कोने में बैठकर सिगरेट के कश खींचने का मजा लेती? कभी मन करने पर दुष्यंत के शेर पढ़ती या मैक्सिम गोर्की के उपन्यास से जीवन का दर्शन खोजती.... औऱ आखिर में यह सवाल कि....आह, मैं यह सब क्यों सोच रहा हूं।
खैर.... ना दिन बदलते थे ना शामें और ना ही रात.....
काम पर जाता था पर किसी से बात करने में जैसे उसकी नानी मरती.... आस पास काम करती लड़कियों को देखकर ऊब होने लगती.... और सवालों का क्रम शुरू हो जाता...
क्यों रोज सज धज के आती हैं, कितना समय लगाती हैं? और आखिर क्यों ? क्या मुटल्ले पांडे को रिझाने के लिए? या पान की पीक से फुर्सत ना पाने वाले बनवारी से इश्क लड़ाने के लिए ? अगर दोनों से नहीं तो इस दफ्तर में तीसरा कौन? मैं? मुझे पटाने के लिए ? और अगर हां... तो मैं इन्हें देखकर खुश क्यों नहीं होता? क्यों ये देविका की तरह.... और ओह... देविका का नाम आते ही जैसे उसके सारे सवाल खत्म हो जाते।
ये एक टूटी दास्तान थी... जिसके एक छोर पर आते ही उसके दिन रात, असली दिन रात जैसे हो जाते... अभी जैसे नहीं रहते.... सारे सवालों को पंख लग जाते और वे उड़कर उसकी पहुंच से कहीं दूर हो जाते। उस दिन वो हिलोरें लेता घर आता... कोने में बैठकर पेट की गहराई जितने गहरे सिगरेट के कश खींचता, अपनी पसंदीदा गजल में खो जाता....
कच्ची दीवार हूं... ठोकर ना लगाना मुझको...
उसकी रूह, सिर्फ संगीत को महसूस कर पाती, उसके दिमाग के लिए तो गजल के शब्द और संगीत जैसे पहुंच से बहुत परे की चीज हो जाते.....
ऐसे ही कभी अवतार सिंह पाश की कविता के फड़फड़ाते पन्ने पर दिखती चंद लाइनें...
सबसे खतरनाक होता है,
मुर्दा शांति से भर जाना...
ना होना तड़प का,
सब कुछ सहन कर जाना,
घर से जाना काम पर
और काम से लौटकर घर आना...
सबसे खतरनाक होता है सपनों का मर जाना।
ओह....... माक्सॆ का अलगाववाद.... हुंह... जैसे उसके मुंह का स्वाद कसैला हो जाता। दिन, एक बार फिर दिन नहीं रहते.... रातें, रातों की तरह नहीं रहतीं। और सवालों के ढेर एक बार फिर उसके मुंह पर धुंए के छल्ले उड़ाने लगते....