Wednesday, July 29, 2009

यही गलतफहमी थी शायद....

वो आए तो हो गया यकीं हमको..
एक इसी की आरजू थी शायद।


दरख्तों के रोने का इल्म ना था,
परिंदों के उड़ने की जिद थी शायद।


फिक्र ना थी कि पाना है तुम्हे,
फिक्र तो जुदाई की थी शायद।



दामन-दामन जर्रा जर्रा बुत बना,
उसीके होने से रौनक थी शायद।

समझते थे कि समझा लेंगे, 
यही गलतफहमी थी शायद।



रास्ते संग थे तो साथ ना थे,
हुए जुदा तो करीबी थी शायद।


खुदा से बढ़कर हम हुए हैं कब,
खुदाई का कोई कतरा थी शायद।





24 comments:

डॉ .अनुराग said...

क्या खूब कहा है......

दरख्तों के रोने का इल्म न था
परिंदों के उड़ने की जिद थी शायद

सुभान अल्लाह....ओर हाँ चित्र भी एक गजल सरीखा ही है....

HEY PRABHU YEH TERA PATH said...

वाह्!! क्या खुब!! अति सुन्दर

आभार/ मगल भावनाऐ

हे! प्रभु यह तेरापन्थ
मुम्बई-टाईगर
SELECTION & COLLECTION

हिमांशु । Himanshu said...

दामन-दामन जर्रा जर्रा बुत बना
उसी के होने से रौनक थी शायद ।"

बहुत पसंद आयी ये पंक्तियाँ । सम्पूर्ण सत्य का सहज उदघाटन । आभार ।

Nirmla Kapila said...

दरख्तों के रोने का इल्म न था
परिंदों के उड़ने की जिद थी शायद
लाजवाब वैसे हर पँक्ति खूबसूरत है बधाई

कुश said...

ये ग़ज़ल तो वाकई दम तोड़ने वाली थी.. दरख्तों वाला और करीबी वाला शेर बढ़िया बन पड़ा है..

‘नज़र’ said...

हर शेअर दिल के बहुत नज़्दीक़ रहा

Ravi Srivastava said...

दमदार लेखन है...

MUFLIS said...

समझते थे क समझा लेंगे
यही ग़लतफहमी थी शायद

वाह !!
किस सादगी से
इतनी बड़ी बात कह दी आपने
बहुत अच्छी रचना है . . .
---मुफलिस---

एक पुराना सा म्यूजियम said...

khoobsoorat gazal

abdul hai said...

दरख्तों के रोने का इल्म न था
परिंदों के उड़ने की जिद थी शायद

Bahut hiUmda

Amit Bhatnagar said...

फ़िक्र ना थी की पाना हैं तुम्हे
फ़िक्र तो जुदाई की थी शायद

बहुत खूब कहा हैं, शायद जिन्दगी भी हम इसी तरह जीते हैं, उन चीजो पर ध्यान दे कर जो हमें नहीं चाहिए, बनिस्बत अपनी शक्ति ऐसी जगह लगाने में जो हम पाना चाहते हैं.

तरूश्री शर्मा said...

Sabhi ka Shukriya.... darasal pahli baar main gazal likh payi...hamesha koshish jarur karti thi!!!

Ravi Srivastava said...

सचमुच में बहुत प्रभावशाली लेखन है... बहुत सुन्दरता पूर्ण ढंग से भावनाओं का सजीव चित्रण... आशा है आपकी कलम इसी तरह चलती रहेगी… बधाई स्वीकारें।
आप के द्वारा दी गई प्रतिक्रियाएं मेरा मार्गदर्शन एवं प्रोत्साहन करती हैं। आप मेरे ब्लॉग पर आये और एक उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया दिया…. शुक्रिया.
आशा है आप इसी तरह सदैव स्नेह बनाएं रखेगें….

From- www.meripatrika.co.cc

ओम आर्य said...

Tarushree ji, aapne bhali-bhanti meri kavita "jor se de mara hai rishta" ke kathya ko antim do laino men samjha hai. saadhubad. main bhi Jaipur men hin rahta hoon.

M VERMA said...

बहुत खूबसूरत
वाह

संजीव गौतम said...

दरख्तों के रोने का इल्म न था
परिंदों के उड़ने की जिद थी शायद
उम्दा रचना.

Vijay Kumar Sappatti said...

amazing poem ji , waah kya khoob likha hai , man ko choo gayi hai aapki rachna ...

aabhar

vijay

pls read my new poem "झील" on my poem blog " http://poemsofvijay.blogspot.com

अर्शिया अली said...

बहुत शानदार लिखा है आपने शायद.
अरे शायद क्या यकीनन.
{ Treasurer-T & S }

विपिन बिहारी गोयल said...

बहुत सुंदर भाव अभिव्यक्ति है

रंजना said...

वाह वाह वाह !!! मन को छू लिया आपकी इस रचना ने... .मन के भावों को अत्यंत भावपूर्ण सुन्दर अभिव्यक्ति दी है आपने....चित्र भी बड़ा ही अनोखा और सुन्दर है....

इस सुन्दर प्रस्तुति के लिए आपका आभार.

अमित पुरोहित said...

Sabhi ka Shukriya.... darasal pahli baar main gazal likh payi...hamesha koshish jarur karti thi!!
ठीक ही कहा, यह कोशिश भी बढिया थी अब गजल लिख भी डालो, बहुत समय हो गया मुझे भी कोई टिप्‍पणी लिखे :)

सागर said...

"फ़िक्र ना थी की पाना हैं तुम्हे
फ़िक्र तो जुदाई की थी शायद...."

तारीफ़ करना ही काफी नहीं होगा शायद ....लेकिन लफ़्ज़ों की बंदिशों से बाहर जज़्बात निकले भी तो कैसे ?

"समझाते थे कि समझा लेंगे
यही गलतफहमी थी शायद !"

अभी बस यही ...!

sumit bhatia said...

gud.....kabil-e-tareef

sumit bhatia said...

gud...kabil-e-tareef