Tuesday, November 25, 2008

यही है ना वो भूख?


दिल्ली की ठंडी शाम थी और महज चार घंटे बाद ट्रेन। मैं, मेरी बहिन और उसकी फ्रेंड सहित हम चार लोग थे और करोल बाग के बाजार में शॉपिंग के बाद एक और दोस्त को साथ लेकर किसी रेस्टोरेंट में खाना खाना था। इसके बाद राजेन्द्र प्लेस की एक होटल से अपना सामान उठाकर नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंचने तक की पूरी कवायद दिमाग में चल रही थी। शॉपिंग पूरी होते होते लगभग दो घंटे बीत गए थे और निकलने के समय कपड़ों की ऑल्टरेशन में लगभग 20 मिनट लगने की बात स्टोर कीपर ने कह दी थी। सोचा, तब तक अपने साथ के एक मित्र को बाहर से कुछ औऱ शॉपिंग करनी बाकी रह गई थी सो वही करा दी जाए। आखिर टाइम मैनेजमेंट पर पूरा ध्यान केंद्रित था। बाहर आ कर खरीददारी करने में बमुश्किल सात आठ मिनट लगे कि तभी गोल गप्पे वाला दिख गया। बस... फिर क्या था, गोल गप्पे वाला दिखे और मैं गोल गप्पे ना खाऊं, ये तो हो ही नहीं सकता ना। सारा सामान उठाकर गोलगप्पे वाले के पास पहुंच गए। इस खाने पीने से निवृत्त होते तब तक पन्द्रह मिनट बीत चुके थे। सो सारा सामान अपने साथ के लोगों के हवाले छोड़कर मैं कपड़े लेने स्टोर पहुंच गई। कपड़े तैयार थे, फटाफट लिए और तब तक सभी लोग बाहर आकर मेरा ही इंतजार कर रहे थे। खाना खाने के लिए साथ आने वाला मित्र भी पहुंच चुका था और हमें निर्धारित स्थान पर पहुंचने के लिए ऑटो रिक्शा ही सबसे उचित साधन लगा। तो बस ऑटो में सवार होकर सभी निर्धारित स्थान पहुंचे कि तभी ध्यान आय़ा...
उफ्फ....मेरा पर्स कहां है?
तभी ध्यान आया कि शायद गोलगप्पे वाले के पीछे खड़ी कार पर ही छूट गया हो। अब क्या किया जाए...
ट्रेन छूटने में महज डेढ़ घंटा बाकी था। बहिन और उसकी फ्रेंड ने कहा हम लोग ढूंढ लाते हैं तब तक आप लोग जाकर खाना ऑर्डर करो... जब तक ऑर्डर पूरा होगा....हम लौट आएंगे।
आईडिया बढ़िया था सो हम लोग दो भागों में बंट गए। खाने का ऑर्डर तो किया लेकिन मन खाने में कम पर्स में ही ज्यादा था। तभी फोन आ गया कि पर्स गोलगप्पे वाले के यहीं मिल गया है और बाकी की सारी कहानी वहां आकर बताते हैं। थोड़ी सांस आई। खाना आने तक वे लोग लौट आए थे। खाना खाते खाते बात हुई...
गोलगप्पे वाले ने पर्स में बम समझकर उसे दूर कम भीड़ भाड़ वाले स्थान पर रख दिया था। पुलिस को इत्तिला इसलिए नहीं दी कि कल से उसका ठेला वहां लगने नहीं देंगे। इन लोगों के जाते ही वो जैसे उबल पड़ा।
ध्यान क्यों नही रखते हैं आप लोग... मेरी रोजी पर संकट आ जाता आप लोगों की वजह से। और भी बहुत कुछ....
शायद इसीलिए कहते हों कि डर के आगे जीत है।
क्या करते, सब कुछ सुनते रहे चुपचाप। आखिर पर्स मिल गया था.... चुपचाप सारी बातें सुनकर और उसे धन्यवाद कहते हुए ये लोग लौट आए। काम निपटा कर सही वक्त पर स्टेशन पहुंचे और ट्रेन भी पकड़ ली। तब कुछ सोचने का वक्त मिल पाया....
इतने भीड़ वाले इलाके से पर्स मिलना नामुमकिन सा लग रहा था... लेकिन मिल गया। खुशी बेहद हुई पर सवालों ने दुखी कर दिया....
अगर वह वास्तव में मेरा पर्स नहीं किसी आतंककारी का रखा बम होता तो कितनी जानें लेता?
मेरे देश का आम आदमी किस दहशत में जिंदगी बसर कर रहा है?
संवेदना भूख पर हमेशा भारी पड़ती है। आम आदमी बेचारा अपनी दो समय की रोटी कमाने के बीच इतना कहां सोच पाता? पर्स देखते ही उसे अपनी बीवी बच्चों की शक्ल याद आई होगी। बम हो सकता है और नहीं भी हो सकता, ऊहापोह में कुछ देर रहा होगा। देश के कानूनी फेर याद आए होंगे और ऐसे में विस्फोट में मरने वालों से ज्यादा खुद ही की चिंता होना लाजिमी था।
कुछ ऐसी ही भूख होती होगी वो जो एक आम आदमी को संवेदनहीन आतंककारी में तब्दील करती होगी....क्या कहते हैं आप?

21 comments:

कुश said...

बातो बातो में कितनी गहरी बात बताई है आपने.. काफ़ी समय से आपके ब्लॉग पर पोस्ट का इंतेज़ार था.. लिखती रखिए..

विक्रांत बेशर्मा said...

बहुत ही सही कहा आपने की भूख ही कुछ लोगों को संवेदनहीन बना देती है ,हम अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं ....यही हकीकत है !!बहुत अच्छी पोस्ट है !!!!!!

Anil Pusadkar said...

सच कहा आपने.आज हर आदमी डरा हुआ है.अच्छी और सच्ची पोस्ट.

mehek said...

bahut sahi kaha ek achhi post ke liye badhai

Wajood said...

किसी साधारण घटना से अहसासों की तह तक पहुंचना कोई आप से सीखे ||

Wajood said...

किसी साधारण घटना से अहसासों की तह तक पहुंचना कोई आप से सीखे ||

Anupam said...

Ap haadason k ek ek pal ko samait leti hain aur usey hubahu utar ker
aam aadmi k jeevan aur vertman paridrishyon se jod ker soch pe majboor ker deti hain. vaakai bahut achcha likha hai.

om prakash said...

Dear Ms. Taru,

Greetings of the day,
I got your reference from http://www.blogvani.com/BloggerDetail.aspx?mode=blog&blogid=1364, after a long gap of 20 yaers again i got the chance to read some of small stories in Hindi. When i clicked on your blog...i only stopped my self after reading all your short stories. It was very touchy and sensible, I amazed after going through the topic and curcumstances . so simply u picked from surroundings and its my gut feeling that you are able to built a story from every moment of your life, perhaps after this mail i would find another story on my self. ( Just kidding). Again thanks. ( forgive me for writting in english coz i am not familiar with Hindi Key Boards)

Regards
Om Prakash Pandey
Media-Consultant
New Delhi

सचिन मिश्रा said...

sahi kaha aapne, acchi post ke liye badhayi.

Radhika Budhkar said...

बेहद अच्छी पोस्ट ,जब जीवन की अच्छाइयो से विश्वास उठ जाता हैं तो इंसान अपना ही शत्रु बन जाता हैं,कुछ आतंवादी के रूप में भी ,अच्छी पोस्ट ,बधाई

बी एस पाबला said...

बेशक, आईये हम सब मिलकर विलाप करें

"अर्श" said...

संवेदना भूख पर हमेशा भारी पड़ती है।

ye line aapki post ki jaan hai bahot hi badhiya likha hai aapne,sath me blog pe padharane ka dhero abhaar.. ummid karata hun sneh paraspar bana rahega.... dhero badhai ke sath....

BrijmohanShrivastava said...

वाकई बहुत डरा हुआ है आदमी

विवेक said...

कलम में जीवतंता और बातों में दिल को छू लेती गहराई...

cartoonist ABHISHEK said...

achchhi post ke liye badhai.
es desh ka aam aadmi
bahut bade jigar wala hai..
NSG men usi ke bachche hen.
kisi VVIP ya VIP ke nahi.
regards

dr. ashok priyaranjan said...

आपने बहुत अच्छा िलखा है । शब्दों में यथाथॆ की अिभव्यिक्त है । मैने अपने ब्लाग पर एक लेख िलखा है । समय हो तो पढें और प्रितिक्रया भी दें -
http://www.ashokvichar.blogspot.com

shyam kori 'uday' said...

... रोचक व संवेदनशील लेख है, शिक्षाप्रद है।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

घटना रोचक है और सोचने को बाध्य भी करती है मगर भूख किसी को आतंकवादी नहीं बनाती है. आज, आतंकवाद एक बड़ा व्यवसाय है जिसमें भरे पेट वाले पढ़े लिखे हैवान शामिल हैं. पहले यह लोग अलग-अलग बैठ कर पशु-शिकार, तस्करी, अपहरण, किराए पर हत्याएं, वैश्यावृत्ति, हवाला आदि में लिप्त थे अब एक तरह से इस सब को इकट्ठा कर के आतंक का साम्राज्य बनाने में लगे हैं.

अशोक मधुप said...

बहुत अच्छी पोष्ट, आपको आंतकियों का धन्यवाद कहना चाहिए जिनकी करतूत से आपका छूटा पर्स सही सलामत मिल गया।

atit said...

संवेदनाओं को झकझोरने वाला आपका ये तजुर्बा, सबक बन सकता है दहशत फैलाने वालों के लिए बशर्ते हम मानवीय संवेदनाओं और संवेदनहीनता में फर्क़ सीख लें।

singh sumit said...

bhut acha likha hai.........jhan je lekh aam admi ke dar ko byan krta hai vhin aisi choti-choti gatnaye jo jindgi me gatti rhti hain hume bhut kush sikhate hain bas hme sikhna v usko age btana jruri hai...jhi hona chahiye media ka udeshya jisse v bhatak gya hai.......journalism ka student hone ke nate me sochta hun ki media me next ane vale yuvaon ko is tarf jrur dyan dena chahiye..jhi hmara safar hai is duniya me ............JAI HIND