Saturday, April 12, 2014
Thursday, May 2, 2013
गज़ल
कहता रहा शर्मिंदा है, अपराधी है मेरा.
क्यों शब्द सच बयान करते थे उसका.
आँखें टटोलती, वो छिपता रहा सबसे,
सज़ा कम थी, गुनाह् बड़ा था उसका.
गलती करके कहता, बेकसूर हूं मैं,
सच है जिगर कम़जोर रहा उसका.
रातों ने शेर कुर्बान कर दिए जिस पे,
हिसाब बेशक़ तमाम लेना है उसका.
रातों ने छीन लिया सुकून जिस का,
तरु वो आए ना आए, नसीब उसका.
.Saturday, October 8, 2011
आखिर कई दिनों बाद वापसी.....

दूर तक बींधती बलखाती नजर को राह के कई नजारे रोक नहीं पाते, तन्हा हो जाते हैं हम और सफर भी.... इर्द-गिर्द का भान हो तो झूठे ही सही, तन्हाई का एहसास नहीं होता। एक सूखा बस गया है भीतर, ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव से अब बरसता ही नहीं कुछ.... एक लम्बी दूरी शायद इसीलिए हो गई। आज आश्चर्यचकित हूं कि एक समय अपनी लेखनी का प्रवाह कैसे थामूं ये सोचती थी और आज क्या लिखूं, ये सोच रही हूं। इतना सूखा, इतना बंजर.... क्यों???
प्रभु, हौसला दे, हिम्मत दे, साहस दे कि एक फसल खड़ी कर सकूं।
Monday, July 25, 2011
Wednesday, July 29, 2009
यही गलतफहमी थी शायद....
वो आए तो हो गया यकीं हमको..
एक इसी की आरजू थी शायद।
दरख्तों के रोने का इल्म ना था,
परिंदों के उड़ने की जिद थी शायद।
फिक्र ना थी कि पाना है तुम्हे,
फिक्र तो जुदाई की थी शायद।

दामन-दामन जर्रा जर्रा बुत बना,
उसीके होने से रौनक थी शायद।
समझते थे कि समझा लेंगे,
यही गलतफहमी थी शायद।
रास्ते संग थे तो साथ ना थे,
हुए जुदा तो करीबी थी शायद।
खुदा से बढ़कर हम हुए हैं कब,
खुदाई का कोई कतरा थी शायद।
एक इसी की आरजू थी शायद।
दरख्तों के रोने का इल्म ना था,
परिंदों के उड़ने की जिद थी शायद।
फिक्र ना थी कि पाना है तुम्हे,
फिक्र तो जुदाई की थी शायद।

दामन-दामन जर्रा जर्रा बुत बना,
उसीके होने से रौनक थी शायद।
समझते थे कि समझा लेंगे,
यही गलतफहमी थी शायद।
रास्ते संग थे तो साथ ना थे,
हुए जुदा तो करीबी थी शायद।
खुदा से बढ़कर हम हुए हैं कब,
खुदाई का कोई कतरा थी शायद।
Wednesday, July 22, 2009
चांद पाने की जिद है जिंदगी!!!
आज फिर दिल ने एक तमन्ना की,
आज फिर दिल को हमने समझाया.

हमेशा लगता है दिल तमन्नाओं का ढेर है जिसमें उम्मीदें बुदबुदे की तरह अंगड़ाई लेती हैं...और जब पकड़ने की कोशिश करो...हाथ ही नहीं आती। कौन है जो दावा करता हो,कि मैं इसे पकड़ने की कोशिश नहीं करता। क्यों ना की जाए...फिर क्या सांस लेना और छोड़ देना जीवन कहा जाएगा? मैं नहीं मानती। जिंदगी की परिभाषा इस बुदबुदे के फूटने और इसे पकड़ने का उपक्रम ही तो है। किसके कितने बुदबुदे फटे और कितने पकड़ने में वो कामयाब हो गया... जिंदगी इसका नाम भी नहीं। बल्कि इसका जरूर हो सकती है कि किसने कितने बुलबुले पकड़ने की कोशिश की।
नाकामियों से जिंदगी की दिशा निर्धारित होती है...दशा नहीं। बल्कि सफलताएं कई बार दिग्भ्रमित करती हैं। आप भटकने लगते हैं और खुशी के सैलाब में एहसास तक नहीं कर पाते। मैं भी भटकी हूं कई बार...आप भी भटके हैं...सवाल है उस भटकाव से कैसे खुद को बाहर खींच लाएं? बहुत मेहनत करनी पड़ती होगी ना...गुरेज नहीं,क्योंकि भटकाव के उद्वेलन से बाहर आने के लिए आप उतनी मेहनत कर सकते हैं जितनी खोती जिंदगी को वापस पा लेने के लिए।
आज ग्रहण था...मैं सूरज और चांद की लुका छिपी से बनने वाली हीरे की अंगूठी (डायमंड रिंग) देखने के लिए उत्सुक थी। मैंने देखी...लगा एक नया बुदबुदा मिल गया है पकड़ने के लिए। फिर कवायद शुरू होगी...लगा जैसे जिंदगी की उमंग लौट आई है। बचपन में मैंने कभी चांद पकड़ने की जिद या कोशिश नहीं की। उम्र बढ़ने के साथ ये जिद कहां से आई,पता नही।
हां इतना पता है इस जिद का एहसास जब-जब हुआ,लगा कि मैं जिंदगी जी रही हूं।
अब मुझे नई रिंग चाहिए... प्रतीकात्मक है। पहले ही कह चुकी हूं मिलना या ना मिलना जिंदगी नहीं, उसे पाने की कोशिश करना जिंदगी है।
चांद पकड़ने की जिद है जिंदगी,
पाने की ख्वाहिश है जिंदगी।
तमाम उम्र जियो ना जियो,
खोकर पाने की कवायद है जिंदगी।
सितारा तो हमेशा दूर होता है,
हसरतों का साथ कब काफूर होता है....
चिड़ियों के बिछौने सी सख्त है राहें,
उन्हें नर्म बनाना ही तो है जिंदगी।
रात से सुबह औऱ सुबह से शाम,
गंवाकर हर दिन अंधेरा तमाम,
फिर दिन उगता है शाम ढलती है,
इसका इंतजार ही तो है जिंदगी।
आज फिर दिल को हमने समझाया.

हमेशा लगता है दिल तमन्नाओं का ढेर है जिसमें उम्मीदें बुदबुदे की तरह अंगड़ाई लेती हैं...और जब पकड़ने की कोशिश करो...हाथ ही नहीं आती। कौन है जो दावा करता हो,कि मैं इसे पकड़ने की कोशिश नहीं करता। क्यों ना की जाए...फिर क्या सांस लेना और छोड़ देना जीवन कहा जाएगा? मैं नहीं मानती। जिंदगी की परिभाषा इस बुदबुदे के फूटने और इसे पकड़ने का उपक्रम ही तो है। किसके कितने बुदबुदे फटे और कितने पकड़ने में वो कामयाब हो गया... जिंदगी इसका नाम भी नहीं। बल्कि इसका जरूर हो सकती है कि किसने कितने बुलबुले पकड़ने की कोशिश की।
नाकामियों से जिंदगी की दिशा निर्धारित होती है...दशा नहीं। बल्कि सफलताएं कई बार दिग्भ्रमित करती हैं। आप भटकने लगते हैं और खुशी के सैलाब में एहसास तक नहीं कर पाते। मैं भी भटकी हूं कई बार...आप भी भटके हैं...सवाल है उस भटकाव से कैसे खुद को बाहर खींच लाएं? बहुत मेहनत करनी पड़ती होगी ना...गुरेज नहीं,क्योंकि भटकाव के उद्वेलन से बाहर आने के लिए आप उतनी मेहनत कर सकते हैं जितनी खोती जिंदगी को वापस पा लेने के लिए।
आज ग्रहण था...मैं सूरज और चांद की लुका छिपी से बनने वाली हीरे की अंगूठी (डायमंड रिंग) देखने के लिए उत्सुक थी। मैंने देखी...लगा एक नया बुदबुदा मिल गया है पकड़ने के लिए। फिर कवायद शुरू होगी...लगा जैसे जिंदगी की उमंग लौट आई है। बचपन में मैंने कभी चांद पकड़ने की जिद या कोशिश नहीं की। उम्र बढ़ने के साथ ये जिद कहां से आई,पता नही।
हां इतना पता है इस जिद का एहसास जब-जब हुआ,लगा कि मैं जिंदगी जी रही हूं।
अब मुझे नई रिंग चाहिए... प्रतीकात्मक है। पहले ही कह चुकी हूं मिलना या ना मिलना जिंदगी नहीं, उसे पाने की कोशिश करना जिंदगी है।
चांद पकड़ने की जिद है जिंदगी,
पाने की ख्वाहिश है जिंदगी।
तमाम उम्र जियो ना जियो,
खोकर पाने की कवायद है जिंदगी।
सितारा तो हमेशा दूर होता है,
हसरतों का साथ कब काफूर होता है....
चिड़ियों के बिछौने सी सख्त है राहें,
उन्हें नर्म बनाना ही तो है जिंदगी।
रात से सुबह औऱ सुबह से शाम,
गंवाकर हर दिन अंधेरा तमाम,
फिर दिन उगता है शाम ढलती है,
इसका इंतजार ही तो है जिंदगी।
Friday, March 20, 2009
वक्त लगा पर किस्सा खत्म हुआ

(उलझा उलझा सा है बहुत कुछ। कई बार दिमाग इतने गहरे और उथले स्तर पर किलोलें करता है कि भाव पकड़ना मुश्किल हो जाए। ऐसे ही किसी चंचल और व्यग्र वक्त को शब्दों में पकड़ने की कोशिश।)
कई कई दिनों की बेचैनी और आए दिन की कलह... बादल छंटने को हैं। रिश्ते की डोर को कब तक उलझाए रखा जाए। दर्द था कि दवा बनता ही नहीं था... उल्टे दिन पर दिन जहर होता जाता।
क्या सोच के सिरे इतने कड़े हो सकते हैं या डर का शिकंजा इतना मजबूत कि इंसान अपने आप से दूर होता चला जाए... अपनी सुविधाओं तक को ताक में रख दे और बेंइंतहा मोहब्बत तक इस ऊहापोह में दम तोड़ दे...
ये उसके जीवन का पहला अनुभव था।
क्या अपनी सोच से बनी काल्पनिक दुनिया की दीवारें इतनी मजबूत हो सकती हैं कि कोई उन दीवारों पर सिर फोड़ फोड़
कर मर जाए...पर वे ना टूटें। परम्पराएं और उससे निकलने के तर्क भोंथरे होने लगें और इस भोंथरी धार पर जिंदगी के सपने कट-कट कर लहुलुहान हो जाए...
सबसे ऊपर इस सबमें आदर्श नीतियों का कोई पुट नहीं,
स्थिति के विश्लेषण की कोई सम्भावना नहीं... फिर इसे सही ठहराएं तो कैसे?
वो कोई स्थिति नहीं जिसमें राहत की कोई किरण नजर आती हो लेकिन सामने वाला आपको उस नीम अंधेरे में सहज रहने की नसीहत दे...बिना किसी दिलासे के। बेहद मुश्किल होता है तर्कों की मजबूत डोर छोड़कर बिना किन्हीं तर्कों वाले मौन कमजोर तिनके से डूबने से बचाने की उम्मीद लगाना।
ऐसा दिमाग तो कतई नहीं कर सकता, बेशक दिल का मामला ये जरूर हो सकता है। लेकिन दिल को भी खाद की जरूरत होती है.. दिलासे के दो बोल या हिम्मती बातें दिल पर हाथ तो जरूर रखती हैं। दिल धड़कने लगता है.... और हाथ उसे महसूस करने।
हालांकि इस भाव में रहने की भी कोई उम्र तो होती होगी ना... उम्र पूरी हो गई... बिना किसी उम्मीद के पूरा हुए.... चलो एक किस्सा खत्म हुआ।
दुखद या सुखद से इतर एक मिले जुले भाव वाला अंत। किसी नए किस्से के सुखद अंत की शुभकामनाएं दीजीए।
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