
परसों पड़ोस के दो छोटे छोटे बच्चे... उम्र छह और सात साल की होगी, शाम को अपने लॉन में खेलते कूदते बातें कर रहे थे। अंधेरा था और कमरे में गर्मी होने की वजह से मैं भी बाहर निकल आई थी, दोनों बच्चो को दीवार के इस पार मेरी उपस्थिति का एहसास नहीं था। खुले दिल से वैचारिक अंदाज में बात कर रहे थे... तुझे पता है पैट्रोल औऱ डीजल महंगा हो गया है।
दूसरा बोला- क्या बात कर रहा है?
पहला - क्या यार तू भी? न्यूज नहीं देखता क्या?
दूसरा - नहीं, मैं तो पापा के साथ अभी पेट्रोल पम्प पर गाड़ी में डीजल डलवाने गया था। खूब भीड़ लगी थी।
पहला - ओहो... तो भी तुझे पता नहीं लगा? आज रात बारह बजे से दाम बढ़ जाएंगे ना... तबी तो सभी पेट्रोल डीजल डलवा रहे हैं।
दूसरा - ओह... तभी पापा कह रहे थे अब घूमना फिरना कम करना पड़ेगा।
पहला - कोई फर्क नहीं पड़ता... दो दिन बाद सब भूल जाएंगे। फिर से घूमना फिरना शुरू हो जाएगा। तू चिंता मत कर।
मुझे आश्चयॆ हुआ एक अपनी उम्र से बड़े और एक बचपन में जीने वाले बच्चे की ये बातें सुनकर। एक माहौल को देखकर नतीजा भांपने वाला बच्चा और दूसरा उसी माहौल को जीकर भी अपने बचपन में मस्त सा। किसे सही बताउं... कुछ देर के लिए परेशान हो गई मैं। रोज टीवी इंटरनेट पर ढेर सारी सामग्री पढ़कर तो जैसे उनके बात करने के टॉपिक ही बदल गए हैं। खैर..चाहे जो हो इन बच्चों को अगर बबलू बबलू कहां गए थे? की जगह पर टेक्नो कविताएं सुनाई जाएं... तो शायद उन्हें खूब मजा आए। कुछ इस तरह....
फीनिक्स.....फीनिक्स,
कहां गए थे?
मंगल की सैर पर क्यों गए थे?
नासा ने तुमको भेजा,
इसलिए गए थे?
इतने सारे टी वी शो थे,
सब पर खूब सारे सेलीब्रिटी थे,
तुम क्यों एलियन्स से मिलने गए थे?
चांद पर घर बनाने की बात है यहां,
तुम मंगल पर जीवन खोज रहे थे?
तस्वीरें भेजो और खोदो जमीन,
हम तो इंटरनेट पर
हर दिन तुमको देख रहे थे।
तरूश्री शर्मा